Saturday, September 3, 2011

शिक्षक दिवस पर विमर्स

आसन्न शिक्षक दिवस पर एक साथी ने यह प्रश्‍न उठाया कि कितने सरकारी टीचर्स ऐसे हैं जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों मे पढ़ने भेजते हैं.यह प्रश्‍न उठाते हुए वे निश्‍चित ही ऐसे अध्यापकों की संख्या जानना नही चाह रहे होंगे बल्कि प्रकारांतर से यह कह रहे हैं कि सरकारी स्कूलों के टीचर्स भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों मे पढ़ाना उपयुक्त नही समझते क्योंकि वे जानते हैं कि उन स्कूलों मे दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता न के बराबर है और उनमे पढ़कर उनका बच्चा उपयुक्त शिक्षा भी नही पा सकेगा, नौकरी या किसी व्यवसाय के लिये दक्षता तो दूर की सोच है. उन्होने यह आक्षेप भी किया कि उन शिक्षकों की प्रतिबद्धता अपने विभाग के प्रति ही नही है, जहां से वे वेतन ले रहे हैं और परिवार चला रहे हैं वहीं अपने बच्चों को नही पढ़ाते. अपवाद भी बहुत हैं, इन्ही सरकारी स्कूलों से पढ़कर बहुत से छात्र सफल हुए हैं और सफल हो भी रहे हैं किन्तु इसमे उनकी अपनी लगन अधिक है,उन स्कूलों की शिक्षा का योगदान नगण्य.
बात केवल सरकारी स्कूलों व उनके उनके अध्यापकों के आचरण की क्यों की जाय.जहां-जहां भी सरकारी दखल है वहां कमोबेश यही बदहाली है और कोई भी जागरुक /समर्थ व्यक्ति उन संस्थाओं की सेवा नही लेना चाहता जिनमे वह काम करता है .यह इस कारण भी है कि वह उनकी सेवाओं की असलियत अपेक्षाकृत अच्छी तरह जानता है. कोई भी सरकारी अधिकारी/कर्मचारी/नेता अपना या अपने परिजनों का इलाज सरकारी अस्पतालों मे कराना पसन्द नही करता, सरकारी सस्ता राशन की दुकानों से सामान नही लेता. रेल सेवाओं एवं अन्य बहुत सी सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं के मामलों मे उसके पास कोई विकल्प नही होता अन्यथा वह इनकी सेवाएं भी न लेना पसन्द करे.
अब रही बात इसकी कि जिस विभाग से वे वेतन लेते हैं उसके व उसकी सेवाओं के प्रति वह प्रतिबद्ध क्यों नही है ? (यहां के सन्दर्भ मे बात यह कि सरकारी अध्यापक जिन स्कूलों से वेतन लेते हैं उनमे अपने बच्चों को क्यों नही पढ़ाते) उनकी यह बात सही है कि वे अध्यापक अच्छी तरह अपने विभाग की असलियत जानते हैं. यह स्थिति भ्रष्‍टाचार के कारण है और शिक्षा विभाग बहुत अच्छे वेतन व काम के कम घंटों के बावजूद गरीब की जोरू है जिससे शिक्षा के अलावा बाकी सब काम लिये जाते हैं. शिक्षक दोपहर का भोजन की व्यवस्था, स्कूल बनवाने, जनगणना व अन्य इतर कार्यों मे व्यस्त रहता है - इनसे समय मिलने पर अपने कार्य निपटाता है... बचा-खुचा समय शिक्षा को भी जाता है तो इन हालात मे कैसी व्यवस्था होगी , सहज ही समझा जा सकता है.
अब रही बात प्रतिबद्धता की, तो यह कतई ज़रूरी नही कि हम जहां से आजीविका कमाते हैं उसके प्रति प्रतिबद्ध भी हों.यह अप्रतिबद्धता निन्दनीय भी नही कही जा सकती.आबकारी विभाग मे सेवारत और वहां से वेतन लेते हुए भी उस विभाग के कर्मचारी/अधिकारी से यह अपेक्षा तो उसके विभाग समेत कोई भी नही करेगा कि वह व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन मे शराब व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करे और उसे प्रोत्साहित भी करे.आजिविका और प्रतिबद्धता दोने नितान्त अलग हैं. हर व्यक्ति बेहतर अवसरों/विकल्प की तलाश मे रहता है और उसे रहना भी चाहिए. गांव का आदमी केवल प्रतिबद्धता के कारण ही गांव मे टिका नही रहता. वह बेहतर कमाई,शिक्षा,स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये शहर जाता है. इसी क्रम मे शहर का व्यक्ति महानगरों मे जाता है. हजारों वर्ष पूर्व हमारे पुरखे भी किसी बेहतर अवसर की तलाश मे ही हिन्द मे झेलम के तट पर उतरे थे.
अब शिक्षक दिवस पर आदर्शों / आदर्श शिक्षक की बात की जाय. हर क्षेत्र की तरह इस क्षेत्र मे भी व्यवसायिकता का बोलबाला है. चिकित्सा, राजनीति, समाज - सेवा आदि कैरियर के रूप मे परिणित हो चुके हैं और सर्वपल्ली राधाकृष्‍णन जैसे शिक्षक की अवधारणा मुश्किल है फिर भी आज भी बिहार मे सुपर-30 चलाने वाले श्री आनन्द कुमार हैं जिन पर हमे गर्व है और उनका उदाहरण हमे आशान्वित करता है कि उम्मीद अभी भी कायम है.
शिक्षक दिवस पर ऐसे शिक्षकों को प्रणाम.
राज नारायण


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